
अप्रैल 2026 | संस्करण #81

हर रविवार ऐसा मौका लेकर नहीं आता।
आजकल बातें या तो जल्दी-जल्दी हो जाती हैं, या फिर ठीक से हो ही नहीं पातीं।
चौपाल बस एक ऐसी जगह है—
जहाँ आप आराम से बैठ सकें,
लोगों को सुन सकें, अपनी बात कह सकें,
बिना किसी जल्दबाज़ी और बिना किसी तय एजेंडा के।
जैसे हैं वैसे आइए, अपने लोगों के साथ।

हाल ही में लिखे इस लेख में हमने एक आसान सा सवाल उठाया है— आख़िर कपड़ा कब ‘बेकार’ हो जाता है, और यह तय कौन करता है?
सीधा सा जवाब है—जब हम उसमें अपनी नज़र से उसकी कीमत देखना बंद कर देते हैं। हमारे घरों में भी ऐसी कई चीज़ें होती हैं—एक अतिरिक्त कॉपी, पुराना स्कूल बैग, एक कंबल—जिन्हें हम इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं। लेकिन सच यह है कि उनमें अभी भी पूरी उपयोगिता और मूल्य मौजूद होता है।
क्या हो अगर हम इन्हीं चीज़ों को किसी और के लिए काम आने वाली संभावना की तरह देखें? यहीं से देखभाल, ध्यान और कुछ करने की सोच शुरू होती है। यह सोच हमें ‘कमी’ से निकालकर ‘सही इस्तेमाल’ और ‘साझा करने’ की ओर ले जाती है।
गूंज का काम इसी सोच—इस बदलाव—को आगे बढ़ाने की एक कोशिश है। यह छोटा सा 5 मिनट का लेख, इस पर थोड़ा ठहरकर सोचने का एक मौका देता है।

जब दुनिया थोड़ी अप्रत्याशित लगने लगे… तो ज़रा रुककर सोचिए।
क्योंकि इसका मतलब यह भी है—अब बहुत कुछ संभव है।
तो आप इसके साथ क्या करना चाहेंगे?
गूंज की एक साल की सेतु फ़ेलोशिप आपको एक मौका देती है— कुछ नया सीखने का, समझने का और ज़मीन से जुड़कर काम करने का।
डर थोड़ा कम, जिज्ञासा थोड़ी ज़्यादा चुनिए।
गूंज सेतु फ़ेलोशिप
नई संभावनाओं को समझने का एक मौका
अधिक जानकारी: https://goonj.org/goonj-setu-fellowship/
अवधि: 1 जुलाई 2026 – 30 जून 2027
आवेदन की अंतिम तिथि: 30 अप्रैल 2026

गूंज: आपदाओं पर दुनिया की सोच बदलने की कोशिश — हॉकिन्स इंडिया कॉन्फ्रेंस 2026
गूंज का मानना है कि विकास में लोगों की भागीदारी सबसे जरूरी है। और जो सामान (material) हमारे पास होता है, वह भी विकास का हिस्सा है। यह सिर्फ गूंज या किसी एक देश की बात नहीं है, बल्कि दुनिया को विकास के बारे में नए तरीके से सोचने की जरूरत है।
हॉकिन्स यूनिवर्सिटी इंडिया कॉन्फ्रेंस में जब अलग-अलग देशों के विशेषज्ञ, शोधकर्ता और नीति बनाने वाले लोग मिले, तब उन्होंने गूंज की प्रदर्शनी “Witnessing Disasters: Myths and Realities” देखी और उस पर चर्चा की।
इस मौके पर अंशु गुप्ता (संस्थापक, गूंज और ग्राम स्वाभिमान) ने गूंज के SARRD फ्रेमवर्क के बारे में बात की। उन्होंने एक आसान सा सवाल रखा— हम ऐसी व्यवस्था कैसे बनाएं जिसमें सबसे कमजोर लोग भी आपदा और विकास की सोच के केंद्र में हों?
SARRD के बारे में जानें- https://goonj.org/sarrd/

कभी याद है जब स्कूल न जाना मतलब थोड़ा और सोना या खेलना होता था? लेकिन कोथाबंडा में बच्चों के लिए स्कूल न जाना उनकी पसंद नहीं था, क्योंकि स्कूल तक जाने का रास्ता सुरक्षित नहीं था।
फिर जब गूंज ने पहल की, तो गाँव के लोग साथ आए और बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ता बनाने के लिए दो पुल बना दिए।
अगर यह कहानी आपको अच्छी लगे, तो इसे अपने बच्चे के साथ घर पर जरूर साझा करें। इसे एक छोटा सा सीखने का पल बनाएं। जब आप उनके साथ बैठकर पुराने स्कूल के सामान को देखते और इस कहानी के बारे में बात करते हैं, तो बच्चे सीखते हैं—देखभाल करना, चीज़ें साझा करना और दूसरों की जरूरत समझना।
गूंज का ‘खुशियों का रीसायकल’ अभियान बच्चों को यह सीख देता है कि चीज़ों का सही इस्तेमाल करें, दूसरों के साथ अपने सामान साझा करें —वह भी अपने घर से और अपनी ही चीज़ों के ज़रिए।
योगदान करें: https://goonj.org/donate/campaign/school-to-school
और जानें: https://goonj.org/s2s/
ईमेल: s2s@goonj.org
