
घर का गेट बना कैंप स्थल: नोएडा सेक्टर-26 में गूंज का शेयरिंग कैंप, 12 अक्टूबर
शेयरिंग कैंप (जिसे पहले कलेक्शन कैंप कहा जाता था) का नाम आते ही अक्सर आँखों के सामने एक ही तस्वीर उभरती है—लोग अपने घरों का अतिरिक्त सामान लेकर पहुँच रहे हैं। लेकिन किसी भी कैंप की असली शुरुआत उससे बहुत पहले होती है, जब बात अपने आस-पास के लोगों तक पहुँचने और उन्हें इस सोच से जोड़ने की आती है।
कैंप से पहले: हाथ से बने पोस्टर और व्यक्तिगत संवाद

हर योगदान का हिसाब: कैंप में आए लोगों की जानकारी दर्ज करते हुए आर. सी. गुप्ता जी
12 अक्टूबर को नोएडा के सेक्टर-26 में गूंज का शेयरिंग कैंप आयोजित होना था। कैंप से कई दिन पहले ही, गूंज के पुराने साथी और 70 वर्ष से अधिक उम्र के वॉलंटियर आर. सी. गुप्ता जी ने लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचाना शुरू कर दिया।
उन्होंने परिचितों को फोन किया, और जब भी किसी से आमने-सामने मुलाक़ात हुई तो कैंप की तारीख साझा करना नहीं भूले। लेकिन वे सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहे। लोग तारीख भूल न जाएँ, इसलिए उन्होंने अपने हाथों से पोस्टर बनाए और कैंप स्थल के आसपास खुद जाकर लगाए, ताकि आते-जाते पड़ोसियों की नज़र उन पर पड़े।
फोन, मुलाक़ातें और खुद से बनाए पोस्टर—गुप्ता जी के लिए यह सिर्फ एक कैंप की सूचना देना नहीं था, बल्कि अपने मोहल्ले में साझेपन और संवाद का एक दायरा तैयार करना था।
जॉय ऑफ़ शेयरिंग मंथ: सिर्फ एक महीना नहीं, साझा करने की आदत है…
यह कैंप गूंज के ‘जॉय ऑफ शेयरिंग मंथ’ का हिस्सा था। अक्टूबर में मनाए जाने वाले ‘दान उत्सव’ की भावना को गूंज महज़ सात दिनों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि पूरे महीने को अपनी सुविधा और समझ से एक-दूसरे का साथ देने, खुशियाँ साझा करने और संसाधनों को सहेजने के उत्सव के रूप में देखता है।
कैंप का दिन: शुरुआत से अंत तक का साथ

सुबह से शाम तक का साथ: कैंप के दिन आर. सी. गुप्ता जी
कैंप के दिन गुप्ता जी और उनकी धर्मपत्नी सुबह से लेकर शाम तक वहीं मौजूद रहे। लोग आते रहे, और दोनों हर आने वाले का स्वागत करते, उनके सवालों के इत्मीनान से जवाब देते और गूंज के काम के बारे में विस्तार से बताते रहे।
एक वॉलंटियर की सबसे सुंदर भूमिका यही होती है—सामान के साथ-साथ इंसानों को जोड़ना और पूरे मन से अंत तक साथ खड़े रहना। दोनों ने पूरे दिन वही आत्मीयता निभाई।
धन्यवाद का एक पौधा
शाम को जब कैंप पूरा हुआ, तो गुप्ता जी ने गूंज टीम के साथी को एक नन्हा पौधा भेंट किया। पूरे दिन के साझा श्रम और साथ के बाद, यह उनका बिना किसी औपचारिकता के “शुक्रिया” कहने का अपना तरीका था।
समर्पण की सीधी-सादी मिसाल
गुप्ता जी की यह पहल बताती है कि वॉलंटियरिंग की कोई तय उम्र या तय तरीका नहीं होता। कोई अपना समय देता है, कोई हुनर, कोई अपनी मेहनत लगाता है, तो कोई महज़ एक पौधा देकर कह देता है—“इस साथ के लिए आभार।”
शुरुआत के लिए किसी बड़े आयोजन की ज़रूरत नहीं होती। अपने मोहल्ले में हाथ से लिखा एक पोस्टर और कुछ घंटों का सच्चा साथ भी एक बड़े बदलाव का बीज बो सकता है।
गूंज के बारे में
शहरों के घरों और दफ़्तरों में रखा वह उपयोगी सामान जो हमारे रोज़मर्रा के काम नहीं आ रहा, ग्रामीण विकास का एक सशक्त माध्यम बन सकता है। गूंज इस सामग्री को दान के रूप में नहीं, बल्कि एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करता है।
गाँव के लोग अपनी प्राथमिक ज़रूरतों—जैसे रास्ते बनाना, तालाब साफ़ करना या स्कूल सुधारने जैसे कामों में श्रमदान करते हैं। इन कामों में उनकी मेहनत, समझ और भागीदारी के सम्मान के रूप में उन्हें सामग्री दी जाती है। इस तरह, बदलाव की दिशा और उसकी प्राथमिकताएँ समुदाय खुद तय करता है।
आप भी साथ जुड़िए:
शुरुआत के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं है, आप जहाँ हैं वहीं से शुरू कर सकते हैं। चाहें तो अपने मोहल्ले में गूंज का शेयरिंग कैंप लगाइए, या गूंज की गुल्लक से शुरुआत कीजिए। आप हमारे साथ वॉलंटियर या इंटर्न के रूप में भी जुड़ सकते हैं। और अगर अभी इनमें से कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो हर महीने आने वाले हमारे न्यूज़लेटर से जुड़कर गूंज के काम और उससे जुड़ी कहानियों के बारे में जान सकते हैं।
जुड़ने के कई तरीके हैं। ज़रूरत है तो बस पहला कदम उठाने की!
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