
मार्च 2026 | संस्करण #80
इस रविवार होने जा रहा है 🙂

हम चौपाल लेकर आ रहे हैं जालंधर में 🙂
चाय की चुस्कियाँ। गरम पकौड़ियाँ। तीखी चटनी।
हँसी, संगीत, कहानियाँ और लोगों का लोगों से मिलना, दिल से दिल की बातें। यही है चौपाल का आनंद।
जैसे हैं, वैसे ही चले आइए। एक दोस्त साथ ले आइए। और इस रविवार साथ मिलकर कुछ अच्छा, सच्चा समय बिताइए। ❤️
गूंज वालंटियर
नीना सोंधी – 9814088616
दीपक बत्रा – 8198062233
टीम गूंज
अंजली मिश्रा – 9354525830
पूजा – 8595510084
Team Goonj:
Anjali Mishra – 9354525830, Pooja – 8595510084

जैसे ही नई क्लास शुरू होती है, देश भर के घरों में स्कूल बैग और अलमारियाँ फिर से देखी जाती हैं। कहीं खाली पन्नों वाली कॉपियाँ, कहीं साफ-सुथरी यूनिफॉर्म, तो कहीं बैग और जूते, जो अभी भी पूरी तरह उपयोग के लायक हैं।
“खुशियों का रीसायकल” के माध्यम से हम परिवारों, स्कूलों और समुदायों को आमंत्रित करते हैं कि वे इन उपयोगी स्कूल सामग्रियों को सोच-समझकर आगे बढ़ाएँ और इस सालाना प्रक्रिया को सस्टेनेबिलिटी का एक सच्चा पाठ बना दें।
कुछ कपड़े हमारी अलमारी से आगे बढ़कर भी किसी के काम आ सकते हैं –
एक नई ज़िंदगी के साथ।

अब तक हम में से कई लोग अपने ऊनी कपड़े समेटकर रख चुके होंगे। स्वेटर, शॉल और कंबल फिर से अलमारियों या संदूकों में रख दिए गए होंगे, अगली सर्दियों तक के लिए। लेकिन उन्हें पूरे साल के लिए बंद करने से पहले, शायद एक बार उस संदूक को फिर से खोलकर देखना ठीक रहेगा।
बहुत से लोगों के लिए ठंड सिर्फ़ एक मौसम नहीं होती – यह एक ऐसा मुश्किल समय होता है, जब गर्म कपड़ों और सुरक्षा की कमी साफ़ महसूस होती है। जैसे-जैसे हम उन कपड़ों को पैक कर रहे हैं जिनकी हमें अब ज़रूरत नहीं है, वैसे-वैसे यह सोचना और भी ज़रूरी हो जाता है कि गर्माहट का असली मतलब क्या है – सिर्फ़ मौसम से राहत नहीं, बल्कि देखभाल, गरिमा और एक-दूसरे के प्रति हमारी साझा ज़िम्मेदारी भी।
कुछ मिनट निकालिए – पढ़िए, सोचिए, और समझदारी से मटेरियल सर्कुलैरिटी को चुनिए, ताकि गर्माहट सिर्फ़ हमारे अपने घरों तक सीमित न रहे, बल्कि और भी दूर तक पहुँच सके।
गूंज.. करो! – सिर्फ़ अपना सामान रीसायकल न करें, बदलाव का हिस्सा बनें।
अपडेट
मुंबई और मेरठ में हुई हमारी हाल की चौपालों की कुछ तस्वीरें साझा कर रहे हैं — लोगों के बीच, लोगों के दिलों तक पहुँचने की हमारी इस सालाना यात्रा से।

ज़मीनी कहानियाँ
हर साल जब सैकड़ों बच्चे नई क्लास में जाते हैं, तो उनके पास बची हुई स्कूल की सामग्री एक नए अवसर में बदल सकती है। यह सिर्फ़ किसी और बच्चे तक सामान पहुँचाने की बात नहीं होती, बल्कि बच्चों को साझा करना, दूसरों की परवाह करना और ज़िम्मेदारी से जीना भी सिखाती है।
ये कहानियाँ दिखाती हैं कि इस साझा करने की यात्रा से छात्रों, अभिभावकों और स्कूलों को कितनी गहरी सीख मिल सकती है – ऐसी सीख जो सच में अनुभव से जुड़ी हो, व्यवहार में उतर सके, संतोष दे और लंबे समय तक साथ रहे।

प्रेरणादायी सीख: उत्तराखंड के उत्तरकाशी ज़िले के जाखरी गाँव में बच्चों की पढ़ाई तक पहुँच को मज़बूत करने की कहानी































