By Anshu Gupta

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कोविदी’ लिख रहा हूँ ..कवितायें वापस आ गयी है। जब तक वायरस से मुक्ति मिलेगी, शायद किताब ही बन जाये..अभी कुछ दुःख वाली होंगी,.दुःखी हूँ ना.. फिर खुशियों पर लिखेंगे. कोविदी में ही !! सुना है और विश्वास है, कि खुशियाँ लौटेंगी। ‘वापस न आने’ वाली पूरी हो गयी है..शुरुआत उसी से ..- अंशु ..


सुनो..
तुम, अब गांव में ही बस जाना..
दो सूखी रोटी खाना..
पर वापस ना आना !!

जानता हूँ..
गांव की जमीन
गिरवी रख आये थे ..
और छुड़ाने को
कुछ जोड़ ही न पाए तुम ..
दिन लगाना..
रात को खटना..
पर वापस न आना !!

जानता हूँ,
माँ को वादा कर आये थे ..
बहन की शादी का
खर्चा जोड़ने का ..
मेहमान चार बुलाना ..
मोहब्बत से थोड़ा ही खिलाना ..
पर वापस ना आना !!

मिट्टी की सड़को पर चलना..
आम के पेड़ के नीचे सुस्ताना..
चुल्लू मे पानी ले, पोखर से पीना..
मिर्च की चटनी से रोटी खाना..
हरियाली पर इतराना..
गीली मिट्टी की खुशबू लेना..
बस वापस ना आना !!

हमने गन्दी गलिया, दी थी ना ..
रहने को तुम्हें ..
तुम्हारी खोली, चूती थी ना..
किसी बड़ी बिल्डिंग के बाजू में..
स्कूल अलग थे ना..
तुम्हारे बच्चों के !!

तुम न जाने
किस-किस को
हफ्ता चुकाते थे..
और फिर तुम्हारे तो..
ठेले भी लाठी खाते थे !!

हम, तुम्हें दीन-हीन,
ग़रीब, बेचारा कहते थे ना..
खुद घरों में घुसकर,
तुम्हे सड़कों पर भूखा,
पैदल छोड़ा था ना..
बस तुम वापस न आना !!

यकीन मानना..
यह सारे शब्द बदलेंगे..
बेचारा कौन है,
अब हम शायद समझेंगे !!

( English one to follow.. )